Ziyarat E Nahiya In Hindi: एक पवित्र और भावनात्मक यात्रा
ज़ियारत ए नहिया एक पवित्र और भावनात्मक यात्रा है जो शियाओं द्वारा की जाती है, खास तौर पर इमाम हुसैन (अस) के प्रेमियों द्वारा। यह यात्रा कर्बला, इराक में स्थित इमाम हुसैन (अस) के मज़ार पर जाने के लिए की जाती है। इस लेख में, हम ज़ियारत ए नहिया के महत्व, इसके इतिहास, और इस पवित्र यात्रा के दौरान पढ़े जाने वाले ज़ियारतनामे के बारे में चर्चा करेंगे।
ज़ियारत ए नहिया का महत्व
ज़ियारत ए नहिया एक ऐसी यात्रा है जो शियाओं के लिए बहुत महत्व रखती है। यह यात्रा इमाम हुसैन (अस) के प्रति अपने प्रेम और श्रद्धांजलि व्यक्त करने के लिए की जाती है। इमाम हुसैन (अ) इस्लाम के तीसरे इमाम थे और उन्होंने अपने परिवार और साथियों के साथ मिलकर कर्बला की लड़ाई में शहीद हुए थे।
ज़ियारत ए नहिया के दौरान, श्रद्धालु इमाम हुसैन (अस) के मज़ार पर जाते हैं और उन्हें श्रद्धांजलि देते हैं। यह यात्रा न केवल एक पवित्र यात्रा है, बल्कि यह एक भावनात्मक अनुभव भी है जो श्रद्धालुओं को अपने इमाम के साथ जुड़ने और उनके प्रेम को व्यक्त करने का अवसर प्रदान करता है।
ज़ियारत ए नहिया का इतिहास
ज़ियारत ए नहिया का इतिहास बहुत पुराना है। यह यात्रा इमाम हुसैन (अ) के शहीदी के बाद से ही शुरू हुई थी। उनके परिवार और साथियों ने उनकी याद में यह यात्रा शुरू की थी, जो आज भी जारी है।
ज़ियारत ए नहिया के दौरान, श्रद्धालु इमाम हुसैन (अस) के मज़ार पर जाते हैं और उन्हें श्रद्धांजलि देते हैं। यह यात्रा न केवल एक पवित्र यात्रा है, बल्कि यह एक भावनात्मक अनुभव भी है जो श्रद्धालुओं को अपने इमाम के साथ जुड़ने और उनके प्रेम को व्यक्त करने का अवसर प्रदान करता है।
ज़ियारतनामे का महत्व
ज़ियारत ए नहिया के दौरान, श्रद्धालु एक विशेष प्रार्थना पढ़ते हैं जिसे ज़ियारतनामे कहा जाता है। यह प्रार्थना इमाम हुसैन (अस) के प्रति अपने प्रेम और श्रद्धांजलि व्यक्त करने के लिए पढ़ी जाती है।
ज़ियारतनामे में, श्रद्धालु इमाम हुसैन (अस) को संबोधित करते हैं और उनके प्रति अपने प्रेम और श्रद्धांजलि व्यक्त करते हैं। यह प्रार्थना एक पवित्र और भावनात्मक अनुभव प्रदान करती है जो श्रद्धालुओं को अपने इमाम के साथ जुड़ने और उनके प्रेम को व्यक्त करने का अवसर प्रदान करती है।
ज़ियारत ए नहिया के लिए हिंदी में ज़ियारतनामे
ज़ियारत ए नहिया के दौरान, श्रद्धालु ज़ियारतनामे पढ़ते हैं। यहाँ एक हिंदी अनुवाद है:
"अस्सलामु अलैका या अबू अब्दिल्लाह, अस्सलामु अलैका या حुसैन, अस्सलामु अलैका या खैर अन्नास, अस्सलामु अलैका या नूर अल्लाह, अस्सलामु अलैका या حجة الله,
मैं आपके पास आता हूँ, आपके परिवार और साथियों के साथ, मैं आपके लिए अपने प्रेम और श्रद्धांजलि व्यक्त करने आया हूँ, मैं आपके साथ जुड़ने और आपके प्रेम को व्यक्त करने आया हूँ।
अल्लाहुम्म इननी अना ज़ाइलुक, फअ्ज़ल ज़ियाराती, व अना आरीफु बिलवफा, लिय वलातुक।
हे अल्लाह, मैं आपका दास हूँ, मैं आपके पास आया हूँ, मैं आपके लिए अपने प्रेम और श्रद्धांजलि व्यक्त करने आया हूँ, मैं आपके साथ जुड़ने और आपके प्रेम को व्यक्त करने आया हूँ।"
निष्कर्ष
ज़ियारत ए नहिया एक पवित्र और भावनात्मक यात्रा है जो शियाओं द्वारा की जाती है। यह यात्रा इमाम हुसैन (अस) के प्रति अपने प्रेम और श्रद्धांजलि व्यक्त करने के लिए की जाती है। ज़ियारतनामे का महत्व इस यात्रा में बहुत अधिक है, जो श्रद्धालुओं को अपने इमाम के साथ जुड़ने और उनके प्रेम को व्यक्त करने का अवसर प्रदान करता है।
उम्मीद है, यह लेख ज़ियारत ए नहिया के महत्व और इसके इतिहास के बारे में जानकारी प्रदान करने में मदद करेगा। यह लेख श्रद्धालुओं को अपने इमाम के साथ जुड़ने और उनके प्रेम को व्यक्त करने के लिए प्रेरित करेगा।
Ziyarat-e-Nahiya al-Muqaddasa (Sacred Side Visitation) is a powerful and emotional prayer attributed to Imam al-Mahdi (A.S.), dedicated to his grandfather, Imam Hussain (A.S.) . While it is traditionally recited on the day of Ashura, it can be recited at any time to reflect on the tragedy of Karbala . हिंदी पाठ (Hindi Transliteration)
यहाँ ज़ियारत के शुरुआती हिस्से का हिंदी लिप्यंतरण (Transliteration) दिया गया है :
बिस्मिल्लाहिर रहमानिर रहीम
अस-सलामु अला आदम-अ सिफ़्वतिल्लाहि मिन खलीक़तिही (सलाम हो आदम पर, जो अल्लाह की मख्लूक में उसके चुनिंदा हैं)
अस-सलामु अला शैथ-इन वलिय्यिल्लाहि व खियरतिही (सलाम हो शीश पर, जो अल्लाह के वली और उसके बेहतरीन बंदे हैं)
अस-सलामु अला इदरीस-अल क़ा-इमि लिल्लाहि बिहुज्जतिही (सलाम हो इदरीस पर, जिन्होंने अल्लाह की हुज्जत को क़ायम किया)
अस-सलामु अला नूह-इन-निल मुजाबि फ़ी दा'वतिही (सलाम हो नूह पर, जिनकी दुआ कुबूल हुई)
अस-सलामु अलल हुसैनिल लज़ी समहत नफ़्सुहू बिमुहजतिही (सलाम हो हुसैन पर, जिन्होंने अपना खून राह-ए-खुदा में कुर्बान कर दिया)
ज़ियारत-ए-नाहिया की मुख्य विशेषताएँ
यह ज़ियारत कर्बला की घटनाओं का सबसे विस्तृत और हृदयविदारक वर्णन पेश करती है :
पैगंबरों को सलाम: इसकी शुरुआत हज़रत आदम (A.S.) से लेकर हज़रत मुहम्मद (S.A.W.W.) तक के महान पैगंबरों को सलाम भेजने से होती है .
कर्बला का मंज़र: इमाम ज़माना (A.S.) इसमें इमाम हुसैन (A.S.) की प्यास, उनकी शहादत के वक़्त की ज़ख्मों, और उनके अहले-बैत (परिवार) की बेबसी का सजीव चित्रण करते हैं .
शहीदों के नाम: इस ज़ियारत में कर्बला के कई शहीदों के नाम और उनके कातिलों का भी ज़िक्र मिलता है .
इमाम का गम: इसमें वह मशहूर जुमला आता है जहाँ इमाम महदी (A.S.) कहते हैं कि "अगर मैं उस वक़्त (कर्बला में) मौजूद न था, तो मैं आपके गम में सुबह और शाम रोऊँगा और आँसुओं के बजाय खून के आंसू बहाऊंगा" . कहाँ से पढ़ें?
आप ज़ियारत-ए-नाहिया का पूरा हिंदी अनुवाद और पाठ निम्नलिखित विश्वसनीय स्रोतों पर देख सकते हैं: ziyarat e nahiya in hindi
Duas.org: यहाँ आपको इसका अरबी पाठ, अंग्रेजी और उर्दू अनुवाद के साथ पूरी तफ़सील मिलेगी .
Scribd (Roman Hindi/Urdu): इस लिंक पर ज़ियारत का रोमन हिंदी/उर्दू दस्तावेज़ उपलब्ध है जिसे आसानी से पढ़ा जा सकता है .
Google Play App: "Ziarat e Nahiya" नाम से मोबाइल ऐप्स भी उपलब्ध हैं जो अनुवाद और ऑडियो की सुविधा देते हैं .
क्या आप इस ज़ियारत का हिंदी अनुवाद (Meaning) विस्तार से जानना चाहेंगे या इसके Recitation (ऑडियो) के लिए कोई लिंक ढूँढ रहे हैं? AI responses may include mistakes. Learn more Ziyarat Nahiya Duas.org
Ziyarat-e-Nahiya: A Powerful Expression of Love and Devotion
Ziyarat-e-Nahiya, also known as Ziyarat Nahya, is a revered ziyarat (supplication) in Shia Islam, specifically recited on the Day of Ashura, which commemorates the martyrdom of Imam Hussein (AS), the grandson of Prophet Muhammad (SAW). This ziyarat is a powerful expression of love, devotion, and condolence to the Ahl al-Bayt (AS), particularly to Imam Hussein (AS) and his family, who were brutally martyred on the plains of Karbala.
The Significance of Ziyarat-e-Nahiya
The word "Ziyarat" comes from the Arabic word "ziyara," which means "visit." In this context, it refers to a visit to the shrines of the Ahl al-Bayt (AS), specifically on the Day of Ashura. Ziyarat-e-Nahiya is a ziyarat that expresses one's sorrow, grief, and loyalty to Imam Hussein (AS) and his family. Reciting this ziyarat is believed to bring one closer to the Ahl al-Bayt (AS) and grant them spiritual growth, forgiveness, and blessings.
The Text of Ziyarat-e-Nahiya
The ziyarat begins with the phrase:
"As-salamu alayka ya Abi Abdillah al-Husayn (AS)"
("Peace be upon you, O Abul Abdillah Husayn (AS)")
The full ziyarat is as follows:
"As-salamu alayka ya Abi Abdillah al-Husayn (AS) As-salamu alayka ya Ibn Rasulillah As-salamu alayka ya khiyaratullah As-salamu alayka ya thiyaratullah As-salamu alayka ya ma'rifatullah As-salamu alayka ya muwakilullah As-salamu alayka ya mawlah al-mu'mineen As-salamu alayka ya wajh al-Qiyamah As-salamu alayka ya quwwat al-abidin As-salamu alayka ya imam al-muttaqin As-salamu alayka ya sayyid al-shuhada' As-salamu alayka ya mawla al- 'arifin As-salamu alayka ya ra'is al-janna As-salamu alayka ya khalifatullah fi al-'ardh Laqad ataytuka bima'rifatillah Fa-inna ma'rifatillah ghiraatun Wa dhukruhu taqwimun Wa 'ibadatuhu tadhnun Wa al-hamdu lillah Allahu akbar La ilaha illallah Muhammadur Rasulullah Wa ahluhu al-'itrah al-tayyibun al-tahirun"
Translation of Ziyarat-e-Nahiya in Hindi
ज़ियारत-ए-नहिया का अर्थ है "अस-सलामु अलैका या अبي عبدिल্লাহ الحسين (अस)" यानी "प्यारे इमाम हुसैन (अस) पर शांति हो"।
इस ज़ियारत का पूरा पाठ इस प्रकार है:
"अस-सलामु अलैका या अbi अब्दुल्लाह हुसैन (अस) अस-सलामु अलैका या इब्न रसूलिल्लाह अस-सलामु अलैका या ख़ियारतुल्लाह अस-सलामु अलैका या ज़ियारतुल्लाह अस-सलामु अलैका या मारिफातुल्लाह अस-सलामु अलैका या मुवक्किलुल्लाह अस-सलामु अलैका या मवला अल-मु'मनीन अस-सलामु अलैका या वज्ह अल-कियामह अस-सलामु अलैका या कुव्वत अल-अबिदीन अस-सलामु अलैका या इमाम अल-मुत्ताकीन अस-सलामु अलैका या सय्यिद अल-शुहादा' अस-सलामु अलैका या मवला अल-'आरिफीन अस-सलामु अलैका या रईस अल-जन्ना अस-सलामु अलैका या ख़लीफतुल्लाह फी अल-'र्ध लकद अtaituka बमारिफातिल्लाह फ़इन्ना मारिफातिल्लाह ग़िरातुन व ज़ुक्रुु तक़्विमुन व 'इबादतुहु तध्नुन व अल-हम्दु लिल्लाह अल्लahu अक्बर ला इलाहा इल्लल्लाह मुहम्मदुर रसूलुल्लाह व अहलुहु अल-'इत्राह अल-तैय्यिबुन अल-ताहिरुन"
Reciting Ziyarat-e-Nahiya
It is recommended to recite Ziyarat-e-Nahiya on the Day of Ashura, which falls on the 10th of Muharram. Shia Muslims around the world recite this ziyarat in congregation, often in masjids (mosques) or husseiniyas (Shi'ite religious centers). The ziyarat is usually recited after the Maghrib (sunset) prayer.
Conclusion
Ziyarat-e-Nahiya is a powerful expression of love, devotion, and condolence to Imam Hussein (AS) and his family. Reciting this ziyarat on the Day of Ashura allows one to connect with the Ahl al-Bayt (AS) and gain spiritual growth, forgiveness, and blessings. It is a way to commemorate the sacrifices of Imam Hussein (AS) and his family and to reaffirm one's commitment to their values and principles.
Ziyarat-e-Nahiya (or Ziyarat-e-Nahiya al-Muqaddasa) is a powerful and emotional salutation attributed to the 12th Imam (Imam Mahdi, a.s.), expressing deep grief over the tragedy of Karbala.
Below is the transliteration in Hindi script followed by a concise Hindi translation of some of the most poignant opening and central verses. Ziyarat-e-Nahiya Transliteration (Hindi Script)
"अस्सलामू अलल हुसैनिल लज़ी समाहत नफ़्सुहु बिमुहजतिही..."
अस्सलामु अलल हुसैन, अल-लज़ी समाहत नफ़्सुहु बिमुहजतिही।
अस्सलामु अला मन अतआहु फ़ी सिर्रिही व अलानियतिही।
अस्सलामु अला मन जअ़लल्लाहुश शिफ़ा-अ फ़ी तुरबतिही।
अस्सलामु अला मनिल इजाबतु तह्ता क़ुब्बतिही।
अस्सलामु अलल मुग़स्सलु बिदमिल जिराह।
अस्सलामु अलल मुज़र्रअ़ि बिल गिसाह। Hindi Meaning (भावार्थ)
यह ज़ियारत कर्बला के शहीदों और विशेष रूप से इमाम हुसैन (अ.स.) की मज़लूमियत का वर्णन करती है:
सलाम हो हुसैन पर, जिन्होंने अपनी जान की बाज़ी लगा दी।
सलाम हो उन पर, जिन्होंने गुप्त और प्रकट रूप से अल्लाह की इबादत की। Ziyarat E Nahiya In Hindi: एक पवित्र और
सलाम हो उन पर, जिनकी मिट्टी (खाक-ए-शिफा) में अल्लाह ने शिफ़ा रखी है।
सलाम हो उन पर, जिनके रौज़े के गुंबद के नीचे दुआएं कुबूल होती हैं।
सलाम हो उन पर, जिन्हें ज़ख्मों से निकलने वाले खून से ग़ुस्ल दिया गया।
सलाम हो उन पर, जिनका शरीर तीरों और तलवारों से छलनी कर दिया गया। Key Themes of the Ziyarat
Imam Mahdi's Grief: The Imam expresses that if he had been present in Karbala, he would have shielded Imam Hussain with his own body.
Visual Descriptions: It describes the scene of the battlefield—the thirst, the falling from the horse, and the sorrow of the household (Ahlul Bayt).
Covenant: It reaffirms the believer's loyalty to the path of justice and sacrifice shown by the martyrs.
ज़ियारत-ए-नाहिया अल-मुक़द्दसा (Ziyarat-e-Nahiya al-Muqaddasa) एक अत्यंत पवित्र प्रार्थना (Supplication) है, जिसे शिया इस्लाम के 12वें इमाम, इमाम अल-महदी (अ.त.फ़.श.)
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। "नाहिया अल-मुक़द्दसा" का अर्थ "पवित्र क्षेत्र" है, जो उस समय इमाम के निवास स्थान की ओर संकेत करता था
यह ज़ियारत मुख्य रूप से इमाम हुसैन (अ.स.) और कर्बला के शहीदों को समर्पित है
। नीचे हिंदी में इसके महत्व और पढ़ने के तरीके की पूरी जानकारी दी गई है:
ज़ियारत-ए-नाहिया का महत्व कर्बला का वर्णन
: इस ज़ियारत में इमाम अल-महदी (अ.स.) ने आशुरा के दिन इमाम हुसैन (अ.स.) और उनके परिवार द्वारा सहे गए दुख और बलिदान का विस्तार से वर्णन किया है अंबिया को सलाम
: इसकी शुरुआत में आदम (अ.स.) से लेकर पैगंबर मुहम्मद (स.अ.व.व.) तक कई नबियों को सलाम भेजा जाता है गहरा शोक
: इसमें इमाम (अ.स.) कहते हैं, "अगर मैं उस समय आपकी सहायता के लिए मौजूद नहीं था, तो मैं आपके लिए सुबह-शाम रोऊंगा और आँसुओं के बदले खून बहाऊंगा"
ज़ियारत पढ़ने का तरीका (Steps to Recite)
ज़ियारत को आशुरा के दिन या किसी भी समय पढ़ा जा सकता है
। इसे पढ़ने के प्रमुख चरण इस प्रकार हैं: शुद्धता (Niyyat & Purity)
: वुज़ू करें और एकाग्रता के साथ इमाम हुसैन (अ.स.) की ज़ियारत की नियत करें सलाम से शुरुआत
: अरबी पाठ या उसके हिंदी अनुवाद के माध्यम से नबियों और इमामों को सलाम पेश करें
इमाम हुसैन (अ.स.) पर विलाप
: ज़ियारत के उस भाग को पढ़ें जहाँ कर्बला की प्यास, ज़ुल्म और शहादत का ज़िक्र है नमाज़-ए-ज़ियारत
: ज़ियारत पूरी होने के बाद, दो रकात नमाज़ (नमाज़-ए-ज़ियारत) पढ़ने की सलाह दी जाती है
पहली रकात में 'सूरतुल अंबिया' और दूसरी में 'सूरतुल हश्र' पढ़ना मुस्तहब (बेहतर) है दुआ और तवस्सुल
: अंत में अल्लाह से इमामों के वसीले (Tawassul) से अपनी जायज़ हाजतें मांगें
हिंदी संसाधन और सहायता Ziyarat Nahiya Duas.org
al-Nahiya al-Muqaddasa (the sacred place) refers to the house of Imam Hasan al-Askari (PBUH) in Samarra. Ziarat e Nahiya Arabic & Urdu - Apps on Google Play
Ziyarat-e-Nahiya al-Muqaddasa (Sacred Visitation of the Area) is one of the most profound and emotionally moving supplications in the Shia Islamic tradition. It is particularly unique because it is attributed to the 12th Imam, Imam al-Mahdi (atfs), who describes the tragic events of Karbala through a deeply personal and graphic lens.
This article explores the significance, history, and key themes of Ziyarat-e-Nahiya, providing context for those seeking it in Hindi. What is Ziyarat-e-Nahiya?
The word Ziyarat means "visiting" or "greeting," often referring to the visitation of holy shrines. Nahiya al-Muqaddasa literally translates to the "Sacred Side" or "Sacred Area," a term used during the Minor Occultation to refer to the 12th Imam. Unlike other Ziyarats, this one serves as a comprehensive eyewitness-style account—relayed through divine knowledge—of the martyrdom of Imam Hussain (as). Key Themes and Structure
The Ziyarat is divided into several major sections that guide the reciter through a spiritual journey:
Salutations to the Prophets: It begins by offering peace to the Prophets, from Adam (as) to Muhammad (saws), establishing Imam Hussain as the heir to their divine message.
Tribute to Imam Hussain: It enumerates his spiritual qualities, describing him as the one who sacrificed his heart's blood and remained loyal to Allah until the end. "आप अकेले थे
Graphic Account of Karbala: The Imam (atfs) describes the physical suffering—the severed arteries, the blood-dyed hair, the unclothed corpses, and the heads raised on spears.
Lamentation of Nature: The Ziyarat describes how the heavens, the earth, the oceans, and the angels wept for the tragedy of Karbala.
Imam al-Mahdi’s Sorrow: In a heartbreaking passage, the Imam expresses his sorrow for not being present at Karbala, stating that because he could not protect Imam Hussain with his life, he will instead cry tears of blood day and night until he meets death. Historical Significance and Authenticity
जब हम कर्बला के वाकये और इमाम हुसैन (अ.स.) की शहादत को याद करते हैं, तो 'ज़ियारत-ए-नाहिया' (Ziyarat-e-Nahiya) का नाम बड़े अदब से लिया जाता है। यह ज़ियारत न केवल एक दुआ है, बल्कि यह कर्बला के मंज़र का वह आईना है जिसे खुद इमाम-ए-ज़माना (अतफ) ने बयान किया है।
इस लेख में हम Ziyarat e Nahiya in Hindi के महत्व, इसकी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और इसके रूहानी फायदों पर विस्तार से चर्चा करेंगे।
ज़ियारत-ए-नाहिया क्या है? (What is Ziyarat-e-Nahiya?)
"नाहिया" का शाब्दिक अर्थ है 'क्षेत्र' या 'दिशा', लेकिन इस्लामी शब्दावली में 'नाहिया-ए-मुक़द्दसा' का इशारा बारहवें इमाम, इमाम महदी (अतफ) की तरफ होता है।
ज़ियारत-ए-नाहिया वह दर्दभरी और रूहानी ज़ियारत है जो इमाम-ए-ज़माना की तरफ से मंसूब है। इसमें इमाम ने अपने जद्द इमाम हुसैन (अ.स.) और कर्बला के शहीदों को बड़े ही मार्मिक अंदाज़ में सलाम पेश किया है और कर्बला के मसाइब (दुखों) का ज़िक्र किया है।
ज़ियारत-ए-नाहिया की मुख्य विशेषताएँ
कर्बला का आँखों देखा हाल: इस ज़ियारत को पढ़ते हुए ऐसा महसूस होता है जैसे कोई आँखों देखा हाल बयान कर रहा हो। इसमें प्यास, भूख, ज़ख्मों और खेमों के जलाए जाने का विस्तृत वर्णन है।
शहीदों का व्यक्तिगत सलाम: इसमें न केवल इमाम हुसैन (अ.स.), बल्कि उनके वफादार साथियों और परिवार के सदस्यों का नाम लेकर उन्हें सलाम किया गया है।
इमाम का दर्द: इसमें इमाम महदी (अतफ) की वह मशहूर पंक्ति आती है— "अगर ज़माना पीछे होता और मैं कर्बला में न हो सका, तो मैं सुबह-ओ-शाम आप पर आंसू बहाऊंगा और आंसुओं के बजाय खून रोऊंगा।"
Ziyarat e Nahiya in Hindi - संक्षिप्त अंश और अनुवाद
हिन्दी भाषी मोमीनिन के लिए यहाँ ज़ियारत के कुछ महत्वपूर्ण हिस्सों का भावार्थ दिया जा रहा है:
सलाम हो हुसैन पर: "सलाम हो उस पर जिसकी बेबसी पर आसमान के फरिश्तों ने मातम किया।"
सलाम हो उन प्यासे लबों पर: "सलाम हो उन सूखे होंठों पर जो प्यास की शिद्दत से नीले पड़ गए थे।"
सलाम हो उन ज़ख्मों पर: "सलाम हो उन गहरे घावों पर जिनसे खून का फव्वारा जारी था।"
ज़ियारत-ए-नाहिया पढ़ने के फायदे
इमाम-ए-ज़माना से जुड़ाव: इसे पढ़ने से इंसान का अपने समय के इमाम से गहरा रूहानी रिश्ता कायम होता है।
गुनाहों की माफ़ी: अहलेबैत (अ.स.) के दुखों पर आंसू बहाना और उनकी ज़ियारत पढ़ना गुनाहों के कफ़ारे का जरिया बनता है।
कर्बला की हकीकत से आगाही: यह ज़ियारत हमें कर्बला के उन पहलुओं से रूबरू कराती है जो आम मजलिसों में कम सुनने को मिलते हैं। इसे कब और कैसे पढ़ें?
यूं तो ज़ियारत-ए-नाहिया साल में कभी भी पढ़ी जा सकती है, लेकिन आशूरा (10 मुहर्रम) के दिन इसका पढ़ना विशेष महत्व रखता है। इसे पढ़ने के लिए:
वुज़ू करें और पाक-साफ लिबास पहनें।
किबला रुख होकर या कर्बला की दिशा में रुख करके अदब के साथ बैठें।
कोशिश करें कि इसके तर्जुमे (अनुवाद) पर ध्यान दें ताकि दिल में कर्बला का दर्द महसूस हो सके। निष्कर्ष
ज़ियारत-ए-नाहिया सिर्फ शब्दों का मजमुआ नहीं है, बल्कि यह एक पोशीदा आंसू है जो सदियों से इमाम-ए-ज़माना (अतफ) की आँखों से बह रहा है। "Ziyarat e Nahiya in Hindi" सर्च करने वाले सभी अज़ादारों के लिए मशवरा है कि वे इसे सिर्फ पढ़ें नहीं, बल्कि इसके अर्थ को समझकर अपने जीवन में इमाम हुसैन (अ.स.) के सब्र और हौसले को अपनाएं।
अल्लाहुम्मा अज्ज़िल लि वलिय्यिकल फ़रज।
क्या आप ज़ियारत-ए-नाहिया का पूरा अरबी पाठ और उसका मुकम्मल हिन्दी अनुवाद एक पीडीएफ (PDF) फॉर्मेट में चाहते हैं?
इस ज़ियारत की एक विशेष ऐतिहासिक पृष्ठभूमि है। इस्लामी इतिहास के अनुसार, जब तीसरे शिया इमाम, इमाम मोहम्मद बाक़िर (अ.स.) या छठे इमाम, इमाम जाफ़र अल-सादिक (अ.स.) कर्बला पहुंचे, तो उन्होंने अपने दादा इमाम हुसैन (अ.स.) के रौज़े के पास खड़े होकर इस ज़ियारत को पढ़ा।
कहा जाता है कि यह ज़ियारत उन आहटों की अभिव्यक्ति है, जब एक पोता अपने दादा की शहादत के स्थान पर खड़ा होकर उनकी पीड़ा और बलिदान को याद करता है। इसमें कर्बला की घटनाओं का वर्णन, यज़ीदी सेना के अत्याचारों का ज़िक्र और इमाम हुसैन के त्याग की महिमा समाहित है।
ज़ियारत में आगे लिखा है:
"उस दिन के दर्द को कैसे बयान करूं? जब आप (इमाम हुसैन) ने अपने परिवार को प्यासा देखा, अपने तीरों से छलनी बदन को देखा, और जब आपका सिर तीर से बिंध गया।"
"आप अकेले थे, न कोई मददगार था, न कोई मदद करने वाला। आपने अपने पवित्र कंठ से पानी मांगा, लेकिन जालिमों ने आपको शहादत का जाम पिला दिया।"
आइम्मा (अ.स.) ने इस ज़ियारत की बहुत तारीफ़ बयान की है:
मूल रूप से अरबी में, लेकिन फ़ारसी, उर्दू, हिंदी और अंग्रेज़ी में इसके अनुवाद और शरह (व्याख्या) उपलब्ध हैं ताकि साधारण लोग इसके गहरे अर्थों को समझ सकें।
ज़ियारत ए नहिया (زیارتِ ناحیہ) शia इस्लामी साहित्य में एक विशेष प्रार्थना/ज़ियارت है जो अक्सर मुशाफ़-ए-इमाम(अलैहिबिस्सलाम) और इमाम हुसैन (रज़ि.) की शहादत और उनके साथियों के प्रति श्रद्धा और शोक व्यक्त करने के लिए पढ़ी जाती है। यह नहिया/ज़ियारत अरबी-फ़ारसी-उर्दू परंपरा में मिलती है और हिन्दी बोलने वाले समुदायों में भी फ़ारसी-अरबी मूल के वाक्यों के साथ हिन्दी व्याख्या में प्रचलित है। नीचे इसका ऐतिहासिक, धार्मिक और साहित्यिक पक्ष संक्षेप में प्रस्तुत है।